Writ Kya Hai

Writ Kya Hai. Indian Constitution के द्वारा यहां के नागरिकों को स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान किया गया है, इसलिए हमारे Fundamental Rights सबसे important है। Fundamental Rights को Supreme Court के द्वारा सुरक्षित रखा जाता है, यानि हमारे अधिकारों का हनन ना हो, इसकी Responsibility Supreme Court की है।

डॉ बी.आर.अंबेडकर जी ने Article 32 को सबसे important बताया है, उन्होंने कहा है कि Article 32 के बिना Constitution meaningless है। Article 32 व Article 226 के तहत ही Writ की प्रक्रिया संभव है। इन articles के द्वारा Court को विशेष शक्तियां प्राप्त हुई है।

तो आज के आर्टिकल मे हम आपको बताएंगे कि Writ क्या है उसके कितने प्रकार है। इस article को पढ़ने के बाद आपको ज्ञात हो जाएगा कि Writ क्यों जरुरी है और इसका उपयोग कैसे व कब किया जाता है।

What is Writ?

Constitution के द्वारा India के court को विशेष शक्तियां सौंपी गई है। इसके अंतर्गत court अपनी शक्तियों का प्रयोग करके India के किसी भी नागरिक को कोई कार्य करने से रोकने का निर्देश दे सकती है। जिसे Writ के नाम से जाना जाता है।

Writ Kya Hai, Writ को Foreign Law से लिया गया है जिसका अर्थ है विशेषाधिकार। यह एक Written Formal Order है जिसे केवल कोई Authorized Body ही जारी कर सकती है और India मे Supreme Court व High court को यह अधिकार प्राप्त है।

Supreme Court व High court Fundamental Rights को Writ के द्वारा ही संरक्षण प्रदान करते है।

Writ, British लोगों के अधिकारों व स्वतंत्रता को कायम करने के लिए साधारण उपचार थे यानि कि यह परंपरा Britain की थी, लेकिन India पर British Government ने शासन किया था, तो वहां से यह अधिकार लिए गए।

पुराने समय में Writ जारी करने का अधिकार राजा के पास होता था, परंतु बाद में Court को यह अधिकार प्रदान किए गए। 1950 से पहले Writ जारी करने का अधिकार केवल कोलकाता, मुंबई, मद्रास High Court के पास था, लेकिन बाद में Article 226 के तहत यह अधिकार प्रत्येक राज्य के High Court को दे दिए गए।

Description of Writ in the Constitution

Constitution में Fundamental Rights का वर्णन किया गया है और यह भारत के प्रत्येक नागरिक के अधिकार होते है। Indian Constitution के Article 32 में Supreme Court Article 226 में High Court को Fundamental Rights को लागू करने का अधिकार प्राप्त है।


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Writ Kya Hai – Types of Writ

भारत देश के प्रत्येक नागरिक के अधिकारों की रक्षा के लिए पांच प्रकार के Writ बनाए गए है, जो निम्न प्रकार है:



  1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus):

यह लैटिन भाषा से निकला शब्द है जिसका अर्थ है “को प्रस्तुत किया जाए” यानि किसी व्यक्ति को प्रस्तुत करने का आदेश। अगर किसी को जबरन हिरासत में लिया गया हो और वह कानूनी रूप से मान्य नहीं हो, तो बंदी प्रत्यक्षीकरण Petition Supreme Court या High Court में दायर कर सकते हैं।

बंदी प्रत्यक्षीकरण के अंतर्गत सार्वजनिक प्राधिकरण (public authority) या व्यक्तिगत दोनों के खिलाफ Petition दायर की जा सकती है।

बंदी प्रत्यक्षीकरण किसे जारी नहीं किया जा सकता:

  • अगर हिरासत Lawful हो
  • कार्यवाही किसी विधानमंडल या Court के Contempt के तहत हो।
  • Court के द्वारा किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का Order दिया गया हो।
  • हिरासत अगर jurisdiction से बाहर हुई हो यानि अगर कोई मामला Court में नहीं आता तो Petition दायर नहीं की जा सकती।
  1. परमादेश (Mandamus):

परमादेश का शाब्दिक अर्थ है- “हम आदेश देते है”। यह एक ऐसा आदेश है जिसके जरिए Court Government Employees पर नियंत्रण रखने का काम करता है, ताकि उनसे उनके कार्यो व कार्य न करने के संबंध में पूछा जा सके।

परमादेश Public Units, Corporations, Subordinate Court, Authority व Government के खिलाफ जारी किया जा सकता है, अगर court को लगता है कि यह सभी संस्थाए ठीक से कार्य नहीं कर रही है।

परमादेश किसे जारी नहीं किया जा सकता:

  • निजी व्यक्तियों व निजी कार्यों के खिलाफ Court परमादेश जारी नहीं कर सकता।
  • जो विभाग Legal नहीं है जैसे- कोई Organization उनके खिलाफ भी परमादेश जारी नहीं किया जाता।
  • भारत के राष्ट्रपति व राज्यों के राज्यपालों के विरुद्ध परमादेश जारी नहीं कर सकते।
  • High Court के Chief Justice जो न्यायिक क्षमता में कार्यरत है, उनके खिलाफ भी परमादेश जारी नहीं किया जा सकता।
  1. प्रतिषेध (Prohibition):

किसी भी चीज को रोकने के लिए प्रतिषेध Court के द्वारा जारी किए जाते है। प्रतिषेध का सामान्य अर्थ है- रोकना।

High Court Judge के द्वारा court को किसी काम को रोकने या जो मामला उनके jurisdiction में नहीं आता, उसे रोकने के लिए प्रतिषेध जारी करता है। प्रतिषेध सक्रिय नहीं रहता है, यह सिर्फ न्यायिक प्राधिकरण के खिलाफ ही जारी की जा सकती है। यह प्रशासनिक प्राधिकरण, विधाई निकायों, व निजी व्यक्ति/निकायों के खिलाफ जारी नहीं की जा सकती।

  1. उत्प्रेषण (Certiorari):

उत्प्रेषण का अर्थ होता है- “प्रमाणित होना” या किसी तरह की सूचना देना। यह आचरण (Behave) से related होता है और इसका प्रयोग कानूनी कार्यवाही में किया जाता है।

उत्प्रेषण के जरिए कोई भी Court अपने Subordinate Courts को यह order देता है कि आप जिस मामले की सुनवाई कर रहे है उसका एक court से दूसरे court में Transplantation कर दिया जाये।

परन्तु Supreme Court या High Court को यह लगता है कि उन्हें किसी मामले की सुनवाई खुद करनी चाहिये, तो वह उस Case को किसी दूसरे court मे Transfer न करके अपने पास मंगवा सकता है।

  1. अधिकार पृच्छा (Quo Warranto):

अधिकार पृच्छा का अर्थ है- “वारंट के द्वारा”। इसे Right of Inquiry भी कहा जाता है। जब कोई आदेश Warrant के द्वारा दिया जाता है तो वह अधिकार पृच्छा के अंतर्गत आता है।

अगर कोई व्यक्ति सार्वजनिक कार्यालय में किसी चीज को लेकर दावा करता है और उस दावे की जांच के लिए Court जो order जारी करता है, वह अधिकार पृच्छा कहलाता है।

यह अन्य 4 Writ से हटकर है क्योकि इसमे कोई भी व्यक्ति किसी पीड़ित की तरफ से Petition दायर कर सकता है।

Writ Kya Hai – Who issues the Writ?

Writ जारी करने का अधिकार केवल Supreme Court व High Court के पास है। Supreme Court Article 32 व High Court Article 226 के अंतर्गत Writ जारी करती है।

How is the Writ jurisdiction of the Supreme Court different from that of the High Court?

अब हम जान चुके है कि Writ जारी करने का अधिकार Supreme Court व High Court दोनों को है लेकिन दोनों के Writ issue करने के अलग-अलग कार्यक्षेत्र है जो निम्न प्रकार है:

  • Supreme Court सिर्फ Fundamental Right के क्रियान्वयन को लेकर ही Writ जारी कर सकता है, जबकि High Court इनके अलावा किसी अन्य उद्देश्यों यानि सामान्य कानूनी अधिकार को लेकर भी Writ जारी कर सकता है।
  • देश के अंदर Supreme Court किसी एक व्यक्ति या सरकार के खिलाफ Writ जारी कर सकता है, लेकिन High Court जिस राज्य का है उस राज्य के व्यक्ति या राज्य के लोगों का संबंध किसी और राज्य से हो तो Writ जारी करता है।
  • Article 32 के अनुसार उपचार अपने आप में Fundamental Right है इसलिए Supreme Court अपने Writ jurisdiction को नकार नहीं सकता है, यानि अगर किसी के Fundamental Rights का हनन होता है और वह Petition दायर करता है तो Supreme Court को सुनवाई करनी होगी।

वही High Court के Article 226 के अनुसार उपचार विवेकानुसार है इसलिए यह अपने Writ jurisdiction को नकार भी सकता है क्योकि इसके अंतर्गत Fundamental Rights नहीं आते है।

इसलिए हम कह सकते है कि Supreme Court Fundamental Right का रक्षक है और यह Guarantee देता है कि हमारे Fundamental Right सदैव बने रहेंगे।



Conclusion

उम्मीद है आपको हमारा आज का यह article Writ Kya Hai पसंद आया होगा और यदि आपके इससे related कोई भी सवाल है तो आप नीचे comment box में लिख सकते है। हम जल्द से जल्द आपके सभी सवालों के जवाब देने का प्रयास करेंगे। यदि आप इस तरह कोई अन्य Post चाहते है तो भी आप नीचे लिख सकते है। हम आपके लिए वह जानकारी अवश्य लेकर आएंगे।

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